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बुधवार, 27 अप्रैल 2011
8:12 am
विवेक दत्त मथुरिया
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शिकायतें बहुत है मगर किसे सुनाउ,
सब मस्त है अपनी ढपली,अपने राग में ।
जिसे देखो,वही हलाक करने में है लगा
यह देश है या कसाइयों का बाड़ा ।
जिंदगी फंसी है जद्दोजहद में ,
जैसे किश्ती फंसी हो भंवर में ।
यू न डर इस रात के अँधेरे से ,
फिर एक नयी सुबह होने वाली है
अगर बनना है तुझे आदमी
जा किसी से दिल लगा .
अगर मरना है तो फिर तू जी ,
ताकि मोंत भी एक जश्न हो तेरा
आदमी होने की बस इतनी तफतीस है
किसी के दर्द का एहसास होता है या नहीं .
सब मस्त है अपनी ढपली,अपने राग में ।
जिसे देखो,वही हलाक करने में है लगा
यह देश है या कसाइयों का बाड़ा ।
जिंदगी फंसी है जद्दोजहद में ,
जैसे किश्ती फंसी हो भंवर में ।
यू न डर इस रात के अँधेरे से ,
फिर एक नयी सुबह होने वाली है
अगर बनना है तुझे आदमी
जा किसी से दिल लगा .
अगर मरना है तो फिर तू जी ,
ताकि मोंत भी एक जश्न हो तेरा
आदमी होने की बस इतनी तफतीस है
किसी के दर्द का एहसास होता है या नहीं .
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