मंगलवार, 1 जुलाई 2014
बुधवार, 18 जून 2014
रविवार, 18 मई 2014
रविवार, 23 फ़रवरी 2014
12:53 am
विवेक दत्त मथुरिया
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विकास यात्रा
----------------
आओ जरा देखें
मानव की विकास यात्रा का सफर
कहां से शुरू हुआ
कहां तक पहुंचा
कहते हैं, आदि मानव से शुरू हुआ
आ पहुंचा है श्रेष्ठ मानव तक
एक विश्लेषण तो करें
तब में और अब में
पहले हमारे पास भाषा नहीं थी
अब भाषा होने पर भी गंूगे हैं
पहले हमारे पास कपड़े नहीं थे
अब कपड़े होने पर भी नंगे हैं
तब कोई कल्चर नहीं थी
अब कल्चर होने पर भी
अनकल्चरड है
तब सेंस नहीं था
अब सेंस होने पर भी नानसेंस हैं
पहले खूंखर जानवरों से लडते थे
अब आदमी से ही डरते हैं
पहले हम निश्चल आदि मानव थे
अब शैतान श्रेष्ठ मानव हैं
वो बचपन था
ये बुढ़ापा है
-----------------@ विवेक दत्त मथुरिया
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आओ जरा देखें
मानव की विकास यात्रा का सफर
कहां से शुरू हुआ
कहां तक पहुंचा
कहते हैं, आदि मानव से शुरू हुआ
आ पहुंचा है श्रेष्ठ मानव तक
एक विश्लेषण तो करें
तब में और अब में
पहले हमारे पास भाषा नहीं थी
अब भाषा होने पर भी गंूगे हैं
पहले हमारे पास कपड़े नहीं थे
अब कपड़े होने पर भी नंगे हैं
तब कोई कल्चर नहीं थी
अब कल्चर होने पर भी
अनकल्चरड है
तब सेंस नहीं था
अब सेंस होने पर भी नानसेंस हैं
पहले खूंखर जानवरों से लडते थे
अब आदमी से ही डरते हैं
पहले हम निश्चल आदि मानव थे
अब शैतान श्रेष्ठ मानव हैं
वो बचपन था
ये बुढ़ापा है
-----------------@ विवेक दत्त मथुरिया
रविवार, 22 सितंबर 2013
2:37 am
विवेक दत्त मथुरिया
No comments
मैं इस वक्त, बेवक्त हूं
-------------------
पर जाहिल और जलील हूं
क्योंकि बीच बाजार खडा हूं
यहां रिश्ते भी तिजारत है
इसलिए बेवक्त हूं
मेरी परेशानी यह है
मेरे पास दो चहरे नहीं है
दूसरा चेहरा कहां से लाउं
और किससे लाउं
जो दुनिया को पसंद आए
मेरे विचार भी समय से मेल नहीं खाते
कैसे गुजारा हो इस दुनिया में
जीना चाहता हूं
मौत का भय भी नहीं है
जीना चाहता जुल्मों की इंतहा के तक
कम से कम मौत को मुझ से मोहब्बत हो जाए
और मर सकूं मौत का सिकदंर बनकर
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मैं इस वक्त, बेवक्त हूं
हूं तो पढा—लिखा पर जाहिल और जलील हूं
क्योंकि बीच बाजार खडा हूं
यहां रिश्ते भी तिजारत है
इसलिए बेवक्त हूं
मेरी परेशानी यह है
मेरे पास दो चहरे नहीं है
दूसरा चेहरा कहां से लाउं
और किससे लाउं
जो दुनिया को पसंद आए
मेरे विचार भी समय से मेल नहीं खाते
कैसे गुजारा हो इस दुनिया में
जीना चाहता हूं
मौत का भय भी नहीं है
जीना चाहता जुल्मों की इंतहा के तक
कम से कम मौत को मुझ से मोहब्बत हो जाए
और मर सकूं मौत का सिकदंर बनकर
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