बुधवार, 27 अप्रैल 2011

शिकायतें बहुत है मगर किसे सुनाउ,सब मस्त है अपनी ढपली,अपने राग में ।जिसे देखो,वही हलाक करने में है लगा यह देश है या कसाइयों का बाड़ा ।जिंदगी फंसी है जद्दोजहद में ,जैसे किश्ती फंसी हो भंवर में ।यू न डर इस रात के अँधेरे से ,फिर एक नयी सुबह होने वाली हैअगर बनना है तुझे आदमी जा किसी से दिल लगा .अगर मरना है तो फिर तू जी ,ताकि मोंत भी एक जश्न हो तेराआदमी होने की बस इतनी तफतीस है किसी के दर्द का एहसास होता है या नहीं...

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

रविवार, 17 अप्रैल 2011

रविवार, 10 अप्रैल 2011

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

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