विजयादशमी दशहरा के पर्व को हम असत्य पर सत्य की जीत के रूप में मानते चले आ रहे है। यह सिर्फ एक परम्परा का मात्र निर्वहन है। राम-रावण के कथानक से जुडी इस परंपरा का हमारे जीवन का कोई सरोकार जुडा है ? ऐसा कुछ दूर - दूर तक कतई दिखाई नहीं देता। हकीकत तो ये है कि आज हमने राम को वनवास देकर अपने अन्दर रावण को जो बसा लिया है। रावण के पास अहंकार के कई आधार थे। हम दरिद्रियों के पास तो अहंकार की कोई वाजिब बुनियाद भी नहीं है। फिर इस मूर्खता की वजह क्या है?...
मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010
सोमवार, 11 अक्टूबर 2010
सदस्यता लें
संदेश (Atom)